Monday, February 9, 2026
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    मुस्लिम परिवेश पर आधारित आदाब अर्ज है नाटक में दिखी प्यार की जीत

    लखनऊ। नाट्य संस्था आकांक्षा थियेटर आर्टस ने उ.प्र. उर्दू अकादमी के सहयोग से मुस्लिम परिवेश पर आधारित मौलियर की मूल नाट्य रचना तथा सलीम आरिफ द्वारा अनुवादित नाट्यकृति आदाब अर्ज है का नाट्य मंचन अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध शोध संस्थान में सुप्रिसिद्ध तुषार बाजपेयी ‘शुभम के निर्देशन में मंचित किया गया।

    इस नाटक को 60 दिवसीय कार्यशाला के अन्तर्गत नगर के वरिष्ठतम रंग निर्देशक प्रभात कुमार बोस, उ०प्र० संगीत नाटक अकादमी अवार्डी के निर्देशन में कार्यशाला का भव्य आयोजन किया गया। नाटक प्रारम्भ होने से पूर्व मुख्य अतिथि के रूप में पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति राघवेन्द्र कुमार, उच्च न्यायालय द्वारा दीप प्रज्जवलित कर आशीर्वाद प्रदान किया गया। विशिष्ट अतिथि के रूप में पदमश्री डॉ. अनिल रस्तोगी, वरिष्ठ वैज्ञानित एवं वरिष्ठतम रंगकर्मी एवं फिल्म टेलीविजन एवं फिल्म कलाकारों को अशीर्वाद प्रदान किया गया।

    नाटक के कथानक के अनुसार सुप्रसिद्ध नाटककार मौलियर की नाटय रचना ‘आदाब अर्ज है’ की शुरूआत कुछ इस प्रकार होती है कि जुम्मन और जुबैदा आपस में पति पत्नी है। उनकी आपसी तकरार से प्रारम्भ होती है। तकरार इस हद तक होती है कि नौबत मार पीट तक आ जाती है। अपने पति के इस व्यवहार के कारण तंग आकर जुबैदा बदला लेने के बारे में सोच रही होती है कि तभी उसकी मुलाकात उस इलाके के रईस गुलमेख मोहम्मद के नौकरों हिकमत उल्ला एवं फरखत उल्ला से होती है जो कि अपने मालिक की गूंगी बेटी के इलाज के लिए एक डॉक्टर की तलाश में निकले हुए है।

    पति से बदला लेने का यह अच्छा मौका

    इन दोनों की बाते सुनगर जुबैदा को लगता है कि पति से बदला लेने का यह अच्छा मौका है। जुबैदा उन्हें बताती है कि यहां पर एक बहुत ही अच्छा डॉक्टर है जो किसी बीमारी को तो पलक झपकते ही ठीक कर सकता है लेकिन परेशानी यह है कि वह अपनी काबिलियत तब तक छुपाये रखेगा जब तक उसकी जमकर पिटाई न की जाये। जरूरत पड़ने पर हम लोग भी उसके साथ वैसे ही पेश आते हैं, हिकमत, फखरक जुम्मन को खोजने निकल पड़ते है।

    जुम्मन की खूब पिटाई

    मुलाकात और बात चीत के बाद दोनों जुम्मन की खूब पिटाई करते हैं। मार खाने के बाद मजबूरन जुम्मन कुबूल करता है कि वो डॉक्टर है। गुलमेख मोहम्मद की बेटी शमीम आरा जानबूझ कर गूंगी बनी हुई है क्योंकि मुलमेख मोहम्मद उसका निकाह उसकी मर्जी के खिलाफ करना चाहते हैं जब कि लड़की आशिक अली को पसन्द करती है। शमीम आरा के इलाज के दौरान जुम्मन को उसकी आया फातिमा से मोहब्बत हो जाती है। इसी बीच जुम्मन की मुलाकात आशिक अली से होती है। जुम्मन आशिक अली को अपना कम्पाउण्डर बनाकर शमीम आरा से मिलवाते है शमीम आरा और आशिक अली घर से भाग जाते है।

    सारी जायदाद का मैं अकेला वारिस

    गुलमेख मोहम्मद जुम्मन को पकड़ कर पुलिस के हवाले करना ही चाहते है कि अचानक आशिक अली शमीम आरा के साथ हाजिर हो जाते है और बताते है कि पहले उनका भागने का इरादा था लेकिन इसी दौरान पता चला कि मेरे चचाजान अल्लाह को प्यारे हो गये है और उनकी सारी जायदाद का मैं अकेला वारिस हूँ। गुलमेख मोहम्मद बहुत खुश होते हैं। अपनी बेटी का निकाह आशिक अली से कराने का ऐलान करते हैं तथा इस खुशी के मौके पर जुम्मन को भी मुआफ कर देते हैं। यहीं पर इस हास्य नाटक का समापन होता है। मुख्य भूमिका में तुषार बाजपेयी, मुस्कान सोनी, योगेश शुक्ला, अंकुर सक्सेना, विकास दूबे ने निभयी।

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